एक साधारण सा पौधा जिसे लोग नशे की चीज मानते हैं,
bhang
वह आपको ब्रह्मांड की सीमाओं से परे ले जा सकता है क्या कोई ऐसा बीज है जो नशा नहीं बल्कि ज्ञान की चाबी हो सकता है जरा सोचिए अगर कोई पौधा आपको अपने भीतर की सबसे गहरी चेतना से जोड़ सके अगर एक वनस्पति आत्मा और ब्रह्मांड के रहस्य खोलने की कुंजी हो तो क्या आप उसे सिर्फ नशा कहेंगे आज हम उस गूढ़ रहस्य की परतें खोलेंगे जिसे सदियों से छुपाया गया है यह कहानी है भांग की एक ऐसा पौधा जो शिव का प्रसाद भी है और आधुनिक समाज की घृणा भी कल्पना कीजिए एक ऐसी रात जब आकाश पूरी तरह से शांत है तारे मानो कुछ कहने को तैयार हैं, और एक साधु हिमालय की गुफा में बैठा है आंखें बंद शरीर स्थिर लेकिन चेतना किसी और ही लोक में तैर रही है क्या वह कोई औषधि थी जिसने उसे इस अलौकिक अनुभव तक पहुंचाया या कोई साधना क्या हो अगर हम आपको बताएं कि वह साधु शिव का उपासक था और उसने ध्यान से पूर्व जो ग्रहण किया था वह कोई नशा नहीं बल्कि एक पवित्र प्रसाद था भांग लेकिन रुकिए क्या आपने भांग को अब तक एक नशीली चीज माना है तो यह कहानी आपके सोच के हर दरवाजे को खोल सकती है आज हम जानेंगे क्या भांग सचमुच आत्मज्ञान की ओर ले जा सकती है या यह सब केवल भ्रम है इस वीडियो को अंत तक देखिए क्योंकि जो आप जानने वाले हैं, वह आपकी चेतना को झक छोड़ सकता है अगर आप भी सत्य की तलाश में हैं, तो इस यात्रा में हमारे साथ चलें चैनल सब्सक्राइब करें और रहस्यों की गहराई में उतरते रहें भांग एक शब्द जिससे कई लोग डरते हैं, तो कुछ आकर्षित होते हैं, लेकिन बहुत कम लोग हैं, जो इसके असली रहस्य को जानते हैं, आज भांग को अक्सर ड्रग नशा खतरनाक पदार्थ जैसे टैग्स से जोड़ा जाता है लेकिन क्या आप जानते हैं, कि यह वही पौधा है जिसे कभी देवताओं का अमृत कहा जाता था
हमारे ऋषि मुनियों ने इसे औषधि नहीं एक साधना का हिस्सा माना यह सिर्फ एक हरी पत्तियों वाली वनस्पति नहीं थी बल्कि एक चेतना को खोलने वाला द्वार एक दिव्य रहस्य हजारों साल पहले जब विज्ञान की भाषा नहीं थी तब भी हमारे पूर्वजों ने इसके गढ़ प्रभावों को समझा था भांग को केवल शरीर को प्रभावित करने वाला पदार्थ नहीं बल्कि मस्तिष्क के अदृश्य द्वारों को खोलने वाला कूट ज्ञान माना गया लेकिन समय बदला समाज बदला और धीरे-धीरे भांग की पहचान एक नशे में बदल दी गई तो क्या यह केवल एक ऐतिहासिक संयोग था या फिर जानबूझकर इस रहस्य को छिपाया गया यदि हम भारतीय संस्कृति के सबसे रहस्यमय और शक्तिशाली देवता महादेव शिव की बात करें तो भांग को उनसे अलग नहीं किया जा सकता कथाओं में कहा गया है कि जब देवता और असुरों ने समुद्र मंथन किया तो उसमें से हलाहल विष निकला पूरा ब्रह्मांड थम गया तब महादेव ने वह विष पी लिया और उनकी तपस्या की अग्नि को शांत करने के लिए भांग को उनके लिए अर्पित किया गया कहते हैं, जब शिव ध्यान में लीन होते हैं, तो उनकी चेतना भांग के माध्यम से और भी गहरी हो जाती है वह सिर्फ समाधि में नहीं जाते अस्तित्व के परे चले जाते हैं, भांग उनके लिए नशा नहीं बल्कि शिवत्व का प्रवेश द्वार थी इसीलिए आज भी महाशिवरात्रि पर शिव के भक्त भांग को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं, लेकिन यह आनंद के लिए नहीं आत्मा से जुड़ने के लिए होता है क्या आप जानते हैं, कि जिस भांग को आज समाज में केवल एक नशीली वस्तु माना जाता है उसका उल्लेख हमारे सबसे प्राचीन और पवित्र ग्रंथों में हुआ है हां वही वेद जो सनातन ज्ञान के शाश्वत स्रोत माने जाते हैं, अथर्ववेद जो चिकित्सा तंत्र और रहस्यमय शक्तियों का भंडार है
उसमें भांग को एक पवित्र पौधा जो भय चिंता और रोगों को हरता है के रूप में वर्णित किया गया है यह केवल एक औषधि नहीं बल्कि दैय आशीर्वाद के रूप में प्रतिष्ठित थी इसमें कहा गया है कि भांग मनुष्य की चेतना को शुद्ध करती है और आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है ऋग्वेद में जिस सोम रस का बार-बार उल्लेख मिलता है उसे लेकर कई विद्वान मानते हैं, कि वह कोई और नहीं बल्कि कैनबस या उससे संबंधित कोई औषधीय संयोजन हो सकता है सोम को अमृत कहा गया वह पदार्थ जिसे देवता स्वयं पीते थे और जिससे अलौकिक शक्तियां जागृत होती थी वहीं तंत्र ग्रंथों में भांग का उपयोग विशेष रूप से ध्यान साधना और मंत्र सिद्धि के लिए किया जाता था कई तांत्रिक अनुष्ठानों में भांग को प्रसाद के रूप में प्रयोग कर साधक स्वयं को भौतिक जगत से मुक्त करते थे ताकि चेतना को ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं से जोड़ा जा सके स्पष्ट है भांग केवल एक वनस्पति नहीं थी बल्कि एक प्राचीन गूढ़ और
आध्यात्मिक उपकरण थी जिसे समझने के लिए ज्ञान और अनुशासन की आवश्यकता थी भांग को लेकर अगर आप यह सोचते हैं, कि यह केवल भारत की परंपरा में रही है तो आप गलत हैं, दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं मिस्र चीन तिब्बत मेसोपोटामिया और मध्य एशिया में भी इसका प्रयोग रहा है चीन के महान दार्शनिक लाउत्से ने इसे ध्यान का धुआं कहा तिब्बती लामाओं ने इसे चेतना की गढ़ खिड़की बताया मिस्र के पुरोहित इसे अंडरवर नेना नेत्रलोक की यात्रा का द्वार मानते थे अमेरिका के इंडियन शमैन इसे आत्मिक सफाई का औजार कहते थे यह सभी परंपराएं अलग थी लेकिन सब ने एक बात को माना यह पौधा केवल नशा नहीं यह एक रहस्य है हमारा मस्तिष्क एक रहस्य है उसमें ऐसे तंत्र और रसायन हैं, जो हमारी चेतना अनुभूति और अनुभव को नियंत्रित करते हैं, भांग विशेषकर इसके तत्व थीसी और सीबीडी हमारे एंडोकनाबिनोइड सिस्टम पर कार्य करते हैं, यह वही प्रणाली है जो सुख ध्यान नींद और अनुभूति को नियंत्रित करती है कुछ न्यूरोसाइटिस्ट्स मानते हैं, कि भांग का सूक्ष्म उपयोग पिनियल ग्लैंड जिसे तीसरी आंख कहा जाता है को सक्रिय कर सकता है यही ग्रंथि ध्यान और अंतर्ज्ञान का द्वार है जब कोई साधक ध्यान की गहराई में जाता है तब मस्तिष्क की थीटा और डेल्टा तरंगे सक्रिय होती हैं, भांग कुछ हद तक इस अवस्था को सहज बना सकती है परंतु क्या इसका मतलब यह है कि हर कोई भांग के माध्यम से समाधि में जा सकता है बिल्कुल नहीं क्या आपने कभी सोचा है कि ध्यान की गहराइयों में जाने के लिए कोई रहस्यमय मार्ग हो सकता है
क्या भांग केवल आनंद का माध्यम है या यह उस शून्य की ओर ले जाने वाला द्वार है जहां आत्मा और ब्रह्म एक हो जाते हैं, क्या यह वही रहस्यमई कुंजी है जिसे साधकों और तांत्रिकों ने सहस्त्राब्दियों से अपने भीतर के ब्रह्मांड के द्वार खोलने के लिए प्रयोग किया यह सवाल सामान्य नहीं है यह प्रश्न हैं, उस चेतना के द्वार के जिनके उत्तर केवल वही पा सकता है जो अपने भीतर उतरने को तैयार हो इस अध्याय में हम उसी द्वार की ओर यात्रा करेंगे जहां पर भांग केवल एक पत्ता नहीं बल्कि एक साधना यंत्र बन जाती है आत्मज्ञान की सीढ़ियों पर चढ़ने का एक गढ़ उपकरण प्राचीन भारत में साधु और तांत्रिक केवल ध्यान में बैठते नहीं थे वे ध्यान को जीते थे
उनका हर श्वास हर संकल्प उस अज्ञात की खोज में था जिसे दुनिया ने परमात्मा कहा ऐसे साधकों के लिए शरीर केवल एक यंत्र था और मन एक दीवार उस दीवार को पार करने के लिए उन्होंने प्राकृतिक साधनों की खोज की और यहीं पर उनका सामना हुआ एक रहस्यमय वनस्पति से भांग कहते हैं, कुछ तांत्रिक परंपराओं में भांग को काया से माया हटाने का पात्र माना गया यह वही साधु होते थे जो शिव को अपने गुरु और मार्गदर्शक मानते थे वे जानते थे कि शिव समाधि में क्यों लीन रहते हैं, और उन्होंने यह भी जाना कि भांग उन्हें उस अवस्था तक कैसे ले जा सकती है इस पौधे का सेवन वे केवल विशेष अवसरों पर करते थे जब ग्रह तारे और आत्मा सभी एक सीध में आ जाए वह कोई रोजमर्रा की आदत नहीं थी वह एक अभिषेक था चेतना का ध्यान कोई रहस्य नहीं रहा आधुनिक विज्ञान भी अब यह स्वीकार कर चुका है कि ध्यान के समय मस्तिष्क अल्फा थीटा और डेल्टा तरंगों में कार्य करता है जो सामान्य चेतना से बिल्कुल अलग अनुभव प्रदान करती हैं, ध्यान के गहरे स्तर पर पहुंचने के लिए मस्तिष्क को शांत होना पड़ता है इंद्रियां निष्क्रिय और अहंकार तिरोहित होना चाहिए अब यहां एक रहस्य और सामने आता है
लेकिन कुछ विशेष कपालभाति कुंडलिनी जागरण या त्राटक ध्यान में इसे मनोद्वार खोलने के उपकरण के रूप में देखा गया वहीं भक्ति मार्ग में शिव को भांग अर्पण करने का अर्थ था हे शिव यह मेरा अहंकार है इसे प्रसाद स्वरूप स्वीकार कर इसे नष्ट कर दो जब कोई साधक भांग का उपयोग करता है तो उसका चित्त खुलने लगता है ऐसे समय पर यदि वह मंत्र जाप जैसे ए यू एम नमः शिवाय या सोहम करता है तो वह ध्वनि तरंग उसके मस्तिष्क के अंदर गूंजती है और गहरी स्थिति में प्रवेश करवाती है मुद्राएं जैसे ज्ञान मुद्रा शून्य मुद्रा या अनाहत मुद्रा शरीर की ऊर्जा को विशेष मार्गों में प्रवाहित करती है जब भांग का सूक्ष्म प्रभाव इन मुद्राओं और मंत्रों के साथ समन्वय में होता है तब साधक सिद्ध बनता है ऐसा व्यक्ति जो अपनी ही चेतना का साक्षात्कार करता है सामान्यतः हमारी चेतना चार अवस्थाओं में कार्य करती है जागृत स्वप्न सुशुप्त और तुरिय भांग इन अवस्थाओं के बीच की रेखाएं मिटा देती हैं, जिससे साधक तुरियातीत स्थिति में प्रवेश कर सकता है जहां कोई द्वंद्व नहीं कोई मैं नहीं केवल शिवत्व है तंत्र ग्रंथों में वर्णन है कि जब साधक ध्यान के साथ भांग का सीमित और संयमित उपयोग करता है तो वह समाधि की दहलीज पर पहुंच जाता है यह अवस्था वह नहीं होती जो किसी कल्पना में है बल्कि वह इतनी वास्तविक होती है कि व्यक्ति आत्मा और परमात्मा के बीच की दीवार को गिरा देता है क्या यह रहस्य आपकी आत्मा को छू रहे हैं, तो रुके नहीं अभी वीडियो को लाइक करें और सब्सक्राइब करें हमारे चैनल को क्योंकि ऐसी ही अद्भुत यात्राएं आपका इंतजार कर रही हैं, जब बात आती है तंत्र की चरम सीमाओं की तो अघोरी परंपरा का नाम सबसे ऊपर आता है अघोरी साधु उन स्थलों पर रहते हैं, जहां आम जन जाना भी पाप समझता है श्मशान वीरान जंगल निर्जन घाट लक्ष्य किसी डर को जीतना नहीं होता बल्कि उस डर की वास्तविकता को पहचानना होता है अघोरी भांग का सेवन विशेष रीतियों से करते हैं, वे इसे तंत्र के दक्षिण मार्ग के औषधीय उपकरण की तरह प्रयोग करते हैं, ध्यान दें यह कोई मौज मस्ती या रसास्वादन का साधन नहीं होता यह केवल उस चेतना के द्वार को खोलने का माध्यम होता है जो आम जीवन के लिए बंद रहता है अघोरी जब भांग के साथ ध्यान में जाते हैं, तो वे अपने शरीर विचार और अहंकार की सीमाएं छोड़ देते हैं,
वे इस जीवन को मृत्यु की गोद में रखकर परम जीवन की खोज करते हैं, यह प्रक्रिया खतरनाक होती है क्योंकि अगर साधना की शुद्धता ना हो तो मन विकृत हो सकता है इसलिए यह मार्ग केवल उन्हीं के लिए होता है जो आत्मा के गहन रहस्यों से टकराने को तैयार होते हैं, भारतीय तंत्र और योग में एक गूढ़ सिद्धांत है नाद योग यह वह साधना है जिसमें ध्वनि को साधन माना गया है एयूएम की ध्वनि को ब्रह्मांड की मूल ध्वनि कहा जाता है और इस नाद के माध्यम से चेतना के स्तरों में प्रवेश संभव है जब कोई साधक भांग के प्रभाव में होकर नाद योग करता है जैसे बीन की धुन डमरू घंटी या विशेष बीज मंत्र तब उसकी चेतना उस ध्वनि के साथ यात्रा करती है उस समय शरीर और मस्तिष्क के सारे बंधन ढीले हो जाते हैं, और वह ध्वनि में समाहित हो जाता है नाद तब केवल श्रवण का विषय नहीं रहता वह एक अनुभव बन जाता है एक रहस्य यह भी है कि भांग का गहन प्रभाव समय की अनुभूति पर पड़ता है वैज्ञानिक भी मानते हैं, कि थीसी जैसे योगिक मस्तिष्क के टेंपरल लोग इस पर असर डालते हैं, जिससे व्यक्ति को समय धीमा ठहरा हुआ या विस्तार लिए प्रतीत होता है योग शास्त्र में समय का पार होना ही कालातीत अवस्था कहलाती है इस अवस्था में साधक को लगता है जैसे वह अतीत वर्तमान और भविष्य तीनों को एक साथ देख रहा है कई साधकों के अनुभवों में यह देखा गया है कि ध्यान की चरम अवस्था में भांग की सहायता से वे अतीत के दृश्यों को पुनः देख सके और कुछ ने तो भविष्य की झलकें तक पाई हैं, क्या यह केवल मस्तिष्क का भ्रम है या वास्तव में चेतना उस स्तर तक पहुंच सकती है जहां समय एक भ्रम है पिछले कुछ वर्षों में भांग और मेडिटेशन पर कई अध्ययन हुए हैं, अमेरिका और इजराइल जैसे देशों में कुछ वैज्ञानिकों ने यह पाया कि सीमित मात्रा में भांग के सेवन से मस्तिष्क में डिफॉल्ट मोड नेटवर्क धीमा पड़ता है जो आत्मचिंतन और ध्यान के दौरान सक्रिय रहता है जब यह नेटवर्क धीमा होता है तब व्यक्ति विचारों के पीछे झांक सकता है उस बिंदु पर पहुंचता है जहां विचार और विचारक के बीच की दूरी मिट जाती है यह वही अवस्था है जिसे ध्यान में एकाग्र समाधि कहा गया है यानी विज्ञान भी अब धीरे-धीरे इस दिशा में जा रहा है जिसे हमारे तांत्रिकों और योगियों ने हजारों साल पहले देखा जिया और सहेजा था कई आधुनिक साधक जो हिमालय की कंदराओं में वर्षों से ध्यान कर रहे हैं, बताते हैं, कि भांग को ध्यानपूक एकाग्रता से और विशेष मंत्रों के साथ लेने पर मन अत्यंत शांत हो जाता है एक योगी कहते हैं, जब मैं भांग का प्रयोग करता हूं तो मेरी सांस की गति धीमी हो जाती है मेरा मन स्थिर हो जाता है जैसे कोई झील जिसमें एक भी लहर ना हो उस समय मैं केवल हूं दूसरे साधक का अनुभव है भांग मेरे लिए शिव का प्रसाद है मैं इसे तभी लेता हूं जब भीतर की यात्रा बहुत कठिन हो जाए यह मुझे वह धक्का देता है जो मुझे मौन की गहराइयों में ले जाता है यहां स्पष्ट है यह साधन है साध्य नहीं उद्देश्य केवल अनुभव करना है खो जाना नहीं भांग एक शक्तिशाली औजार है लेकिन हर औजार का प्रयोग सावधानी से होना चाहिए जो व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर हो या जिसका उद्देश्य केवल नशा हो उसके लिए यह मार्ग नहीं है
यह अग्नि है यह तपाए भी सकती है,,,
और भस्म भी कर सकती है,
सभी प्राचीन ग्रंथों में भांग के साथ साधना का उल्लेख विशेष परिस्थिति गुरु की देखरेख और संयम के साथ ही किया गया है,
यह कोई दैनिक सेवन की वस्तु नहीं यह यात्रा का साधन है ,
और केवल वही इस यात्रा पर जा सकता है,
जो भीतर उतरने की हिम्मत रखता हो आखिरकार यह समझना आवश्यक है,
कि भांग मंजिल नहीं है,
वह केवल एक सीढ़ी है ,
जो ध्यान की ऊंचाइयों की ओर ले जाती है असली साधना तो उस क्षण शुरू होती है,
जब व्यक्ति इस सीढ़ी को पार कर जाता है,
जब उसे भांग की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि चेतना अब स्वतः ही मुक्त हो चुकी होती है,
भांग तब केवल एक स्मृति रह जाती है,
उस यात्रा की शुरुआत की जिसने आत्मा को भ्रम से जोड़ दिया भांग ध्यान साधना और शिव यह चारों शब्द अपने आप में एक ब्रह्मांड है जब इनका समन्वय होता है,
तो साधक केवल बैठा नहीं रहता वह उड़ने लगता है उसकी उड़ान शून्य की ओर होती है जहां कोई शब्द नहीं कोई रूप नहीं केवल अनुभव होता है शायद यही कारण है,
कि हर शिवरात्रि पर लाखों लोग भांग का सेवन करते हैं,,
यह कोई मेला नहीं यह चेतना की सामूहिक यात्रा है वे सब जानते हैं,
कहीं ना कहीं भांग उन्हें शिव के और करीब ले जाएगी और शिव केवल एक देव नहीं बल्कि वह अनुभव हैं,
जो ध्यान की अंतिम अवस्था में होता है क्या आप भी उन अनगिनत जिज्ञासुओं में से एक हैं,
जिनके भीतर एक सवाल कई वर्षों से गूंजता आया है,
क्या आत्मज्ञान किसी वनस्पति के सहारे संभव है क्या शिव की भांग सिर्फ एक मिथक है ,
या फिर यह किसी गहरे गुप्त सत्य की ओर इशारा करती है क्या यह एक ऐसा साधन है जिसे समझ लिया जाए तो चेतना के सभी दरवाजे खुल सकते हैं,
या फिर यह बस एक भ्रम है एक मायाजाल जो हमें आत्म मुग्ध कर देता है,
लेकिन आत्मा से दूर ले जाता है |
तो क्या आत्मज्ञान किसी बाहरी वनस्पति के सहारे प्राप्त किया जा सकता है, |
शायद शुरुआत में हां लेकिन अंत में नहीं आत्मज्ञान का अंतिम सत्य तब आता है,|
जब साधक अपने सभी सहारों को छोड़ देता है |
मंत्र यंत्र भांग ध्यान की तकनीक सब कुछ वह जब केवल शुद्ध होने की अवस्था में पहुंचता है तब ब्रह्म प्रकट होता है |
इसलिए भांग को लेकर यह कहना उचित होगा यह उस द्वार की कुंजी हो सकती है|
जहां से यात्रा शुरू होती है लेकिन वह यात्रा उसी दिन पूरी होती है|
जब साधक उस कुंजी को पीछे छोड़ देता है |
अब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि भांग सही है|
या गलत प्रश्न यह है क्या आप इसके लिए तैयार हैं,|
क्या आप वह साहस रखते हैं, |
जो माया के पर्दों को चीर कर ब्रह्म से मिलने के लिए चाहिए क्या आप वह अनुशासन और विवेक रखते हैं,|
जिससे इस वनस्पति को औजार की तरह उपयोग कर सकें ना कि नशे की लत में फंस जाए यह रहस्य आपके भीतर है|
और इस वीडियो का अंतिम प्रश्न भी क्या आप उस साधक की तरह हैं,|
जो बाहरी साधनों को छोड़कर अंततः स्वयं की आत्मा से जुड़ता है|
या फिर आप अभी भी भ्रम और भ्रम के बीच झूलते हुए एक उत्तर की तलाश में हैं,|

